विवाह: क्या और कितने रूप ???

 हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
      हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रम्हचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है।

किसे कह सकते हैं विवाह ?
विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है । दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं । स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं । विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है । इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है । एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है । वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके ।

विवाह के प्रकार:
1. ब्रह्म विवाह: दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "अरेंज मैरेज" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
2. दैव विवाह: किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
3. आर्श विवाह: कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह: कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह: परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।
6. असुर विवाह: कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
7. राक्षस विवाह: कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।
8. पैशाच विवाह: कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।

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हिन्दू विवाह में सात फेरे क्यूं ?

अधिकाँश लोग सिर्फ इतना ही जानते हैं कि विवाह में पति-पत्नी एक साथ सात फेरे लेते हैं, पर ये कम ही लोग जानते हैं कि सात ही फेरे क्यों और इन सातों फेरों के पीछे कौन से अर्थ छिपे होते हैं? हिन्दू विवाह में सात फेरों का कुछ ख़ास ही महत्व है. सात बार वर-वधू साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर फौजी सैनिकों की तरह आगे बढ़ते हैं. रीतियों के अनुसार सात चावल की ढेरी या कलावा बँधे हुए सकोरे रख दिये जाते हैं, इन लक्ष्य-चिह्नों को पैर लगाते हुए दोनों एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं, रुक जाते हैं और फिर अगला कदम बढ़ाते हैं. इस प्रकार सात कदम बढ़ाये जाते हैं. प्रत्येक कदम के साथ एक-एक मन्त्र बोला जाता है. पर हमारे समाज में पंडितों को नियमों की अपुष्ट जानकारी होने के कारण उनके द्वारा सात फेरे अलग-अलग तरहों से कराये जाते हैं, पर एक बात तो होती ही है और वो है - सात फेरे.
            आइये बताते हैं कि हिन्दू विवाह में सात फेरे ही क्यों लिए जाते हैं. सात फेरों में पहला कदम अन्न के लिए उठाया जाता है, दूसरा बल के लिए, तीसरा धन के लिए, चौथा सुख के लिए, पाँचवाँ परिवार के लिए, छठवाँ ऋतुचर्या के लिए और सातवाँ मित्रता के लिए उठाया जाता है. मतलब यह कि पति-पत्नी के रिश्तों में ईश्वर को साक्षी मानकर दोनों प्रण करते हैं कि एक दूसरे के लिए अन्न संग्रह, धन संग्रह करेंगे और मित्रता स्थापित करते हुए एक-दूजे की ताकत बनेंगे. ऋतुचर्या का पालन करते हुए न सिर्फ एक-दूसरे को सुख देने का प्रयास करेंगे, बल्कि एक-दूसरे के परिवार को भी सुखी रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहेंगे.
           हालांकि शादी के दौरान जाने-अनजाने तो सभी सात फेरे लगा लेते हैं, पर यदि आपसी तालमेल बिठाने में पति-पत्नी सफल न हो सके तो सात फेरे लेने के बावजूद सात जनम तक साथ रहने की बात तो दूर,सात कदम भी साथ चलना पति-पत्नी के लिए दूभर हो जाता है.

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हिन्दू विवाह के प्रतीक चिन्ह: एक परिचय

कहते हैं शादी बनारस का लड्डू है, जो खाया वो भी पछताया और जो न खाया वो भी पछताया. जो भी हो हिन्दू समाज में अक्सर लोग इस लड्डू को खा कर ही पछताते हैं, यानि शादी प्राय: सभी करते हैं और आज की अरेंज मैरेज में सभी विधि-विधान का भी कमोबेश वो पालन अंधाधुंध करते हैं.
         यहाँ 'अंधाधुंध' शब्द का प्रयोग कर मैं सिर्फ ये कहना चाहती हूँ कि विधि-विधान का अनुसरण तो लोग करते हैं, पर बहुत कम ही ये जानते हैं कि विवाह के दौरान प्रयोग किये गए प्रत्येक 'वैवाहिक प्रतीक चिन्ह' के पीछे भी कोई न कोई अर्थ होता है.
     तो आइये जानते हैं कुछ महत्वपूर्ण प्रतीक चिन्हों के वैदिक, पौराणिक तथा आधुनिक महत्वों को:

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'अंगूठी' का रिश्तों में महत्व

हिन्दू विवाह के सभी प्रतीकों में सबसे ज्यादा सामान्य प्रतीक अंगूठी ही है और ये विवाह के बाद भी लम्बे समय तक प्रयोग में लाया जाता है.
       ऐसा माना जाता  है कि कन्या की अंगुली में  अंगूठी पहनने का रिवाज 'गन्धर्व विवाह' से प्रारंभ हुआ, यानि चोरी-छुपे विवाह में लड़की की  अंगुली में अंगूठी डाल देने का उद्येश्य  शायद ये रहा होगा कि समाज ये समझ ले कि इसकी शादी हो चुकी है और फिर से उसका विवाह न कराया जाय.
         इतिहास के पन्नों को अगर पलटा जाय तो अंगूठी के महत्व के प्रमाण 'ग्रन्थ युग' से ही मिलने लगते हैं. रामायण और महाभारत में भी अंगूठी महत्व की वस्तु के रूप में सामने आई है. सीता को जब रावण ने अपहरण कर अशोक वाटिका में रखा था और हनुमान जब सीता के पास राम का दूत के रूप में पहुंचे थे तो उन्हें यह विश्वास दिलाने कि सचमुच उन्हें श्रीराम ने ही भेजा है, वे राम के द्वारा  दी गई अंगूठी सीता को दिया था.
     पारंपरिक रूप से अंगूठी सोने के बने होते थे, चूंकि सोना अन्य धातुओं की तुलना में महंगा होता था, पर आज 'हीरे की अंगूठी' 'हीरा है सदा के लिए' कह कर ज्यादा लोकप्रिय हो रही है.
       एक समय यह माना जाता था कि विवाह के अवसर पर अंगूठी पहनाने का अर्थ एक पवित्र रिश्ते की शुरुआत करना है और वर अपनी पत्नी को आजीवन प्यार देने और उसकी देखभाल करने के लिए कृतसंकल्प है, पर आज इसे सिर्फ दो लोगों के मिलन का प्रतीक माना जाता है. पूर्व में औरतें अंगूठी अपने बाएं हाथ की चौथी अंगुली 'अनामिका' में ही पहना करती थी.
         वैसे अगर एक लोकप्रिय मान्यता पर विश्वास करें और इसके वैज्ञानिक पहलू पर गौर करें तो बाएं हाथ की चौथी अंगुली के नस और तंत्रिका का सम्बन्ध ह्रदय से होता है और इसमें पहनी गई अंगूठी ह्रदय को सही ढंग से काम करने में मदद पहुंचाती है.
           अंगूठी का पारंपरिक जो भी महत्व हो पर ये बात बहुत हद तक सही है कि अंगूठी एक ऐसा प्रतीक है जिसके विषय में माना जाता है कि यह  सम्बन्ध को मजबूत  साथ ही अंतहीन प्यार को बनाये रखता है.

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मंगलसूत्र- क्या है इसका महत्व ?

हिन्दू विवाहिता के सुहाग के प्रतीक के रूप में मंगलसूत्र सबसे चर्चित प्रतीक हुआ है. भारतीय फिल्मों ने भी इस सुहाग कि निशानी को 'हिट' करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. मंगलसूत्र विवाहिता द्वारा गले में पहनने का जेवर है.जिस तरह ईसाई धर्म में अंगूठी एक अत्यावश्यक प्रतीक है, ठीक उसी तरह हिन्दू धर्म में 'नेकलेस' यानि मंगलसूत्र विवाहिता का एक अत्यावश्यक प्रतीक चिन्ह है जो सदियों से प्रयोग में लाया जाता रहा है.
           'कूर्ग' का वैवाहिक गले का हार काले छोटे दानों से बना होता था जो सोने की कड़ियों से आपस में जुड़े होते थे. एक इसी तरह के नेकलेस मोहनजोदड़ो में भी खुदाई से प्राप्त हुआ है. प्राचीन काल में अष्ठ्मंग्लक माला भी इसी की कड़ी माना जाता है,जिसमे आठ प्रतीक होते थे और बीच में एक 'लौकेट' हुआ करता था जो साँची के बुद्धिस्ट प्रतीक के रूप में अपनाया गया है.
         अपने मूल रूप में 'मंगलसूत्र' या 'करथा मणि' काले धागे में गूथे हुए आठ मोतियों से मिलकर बना होता था जिसमे बीच में एक सोने का 'लोकेट' गोल आकार का स्थित होता था. काले रंग की प्राथमिकता इसमें होने का मतलब ये माना जाता था की दुल्हन को कोई बुरी नजर न लगे.परन्तु वर्तमान में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ये अलग-अलग स्टायल में लोकप्रिय हो गया है.
              जो भी हो मंगलसूत्र वैवाहिक प्रतीकों में सबसे मत्वपूर्ण स्थान तो रखता ही है,साथ ही ये माना जाता रहा है कि ये दुल्हन के लिए काफी शुभ होता है और उसे बुरी नजर से बचाते हुए उसे भाग्यशाली बनती है.

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मेहंदी तो रंग लायेगी ही

मेहंदी  एक खूबसूरत सी  कला है जिससे तुरंत याद आती है शादी  के  लिए उत्सुक दुल्हन. यह रस्म  संभवत: हिंदू और मुस्लिम दोनों में   प्रचलित है पर मुस्लिमों में मेहंदी बहुत ही नजाकत और कलाकारी से  लगाई  जाती है. यह रस्म शादी से दो या तीन दिन पहले होती है. कुछ जगहों पर इसे  "मांझा" भी कहा जाता है जिसमें  कन्या के हाथ  और पाँव  में मेहंदी रचाई जाती है साथ ही साथ संगीत और नृत्य का भी आयोजन  किया जाता है.  इस तरह कि परंपरा कश्मीरी, पंजाबी और राजस्थानी परंपरा का अविभाज्य अंग है. यहाँ  मेहंदी  दुल्हा के घर से दुल्हन के घर  भेजी  जाती है  और यहाँ दुल्हन को रस्मों रिवाजों से साथ मेहंदी को लगाया जाता है. मेहंदी का ही एक और प्रकार बंगाल,उडीसा,बिहार और पूर्व उत्तरप्रदेश में प्रचलित है जिसे "अलता" के  नाम से जाना जाता है. इसे लगाने का बड़ा  ही सरल और आसान तरीका है जिसमे लाल रंग का गोल तलहथी पर और पावं में  लगाया जाता है जिसे सुहागन के  लिए काफी शुभ माना जाता है. संभवत: मेहंदी पुरे देश का सबसे लोकप्रिय श्रृंगार  माना जाता है. ऐसा माना  जाता है कि मेहंदी जितनी अधिक रंग लायेगी पति का पत्नी  से प्यार उतना ही गहरा होगा.

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नथ और हिंदू विवाह

जैसा कि हमने सुहाग के दो महत्वपूर्ण प्रतीक को जाना जिसमे अंगुठी ईसाई धर्म में ज्यादा प्रचलित है और मंगलसूत्र हिंदू धर्म में  उसी प्रकार तीसरा महत्वपूर्ण प्रतीक नथ है जिसका प्रचलन मुसलमानों में ज्यादा है लेकिन अब सम्भवत: सभी धर्म में इसका प्रयोग  होने लगा है. नथ के संबंध में  कहा जाता है की इसे कन्या को सात फेरे से पहले पहनाया जाता है. मुस्लिम में तो इसे अनिवार्य मन जाता है. किसी भी धर्मिक उत्सव पर सुहागन द्वारा धारण किया जाता है.
    नथ का प्रचलन उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब,बंगाल, जम्मू कश्मीर में देखा जाता है जहाँ इसे कई नाम से जाना जाता है.
     राजस्थान:- यहाँ की नथ कीमती पथर की बनी होती है जिसे भोरिया कहते हैं. दूसरा लंग जो क्लोभ   के आकार का होता है तीसरा लटकन जो मोती का बना होता जिसे नाक के बीच में पहनती है.
    उत्तरप्रदेश:- यहाँ नथ को चुनी के  नाम से जानते है जो सोने की बनी होती है और उसमें मोती भी लगे होते हैं.
    पंजाब:- यहाँ इसे बुलक्नाथ कहते है या लटकन मोमी भी कहते हैं जो काफी लंबी और अंडाकारहोती है.
          इस प्रकार नथ के सबंध में  पौराणिक मान्यता के  अलावा कुछ वैज्ञानिक कारण भी है. इससे कन्या में खुशबू  महसूस करने की की क्षमता बढ़ती है.

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भारतीय विवाह और चूड़ियां

किसी भी चीज की पहचान तब बढ़ती है जब उसके महत्व को समझा जाय. ठीक यही स्थिति  सुहाग के प्रतीकों की है जिसका महत्व प्राचीन सभ्यता से ही देखने को मिलता है. जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो मोहनजोदरो तथा हडप्पा काल की स्त्रियों की कलाई चूड़ियों  से सजी होती थी. उस समय की स्त्रियां बाजू  तक चूड़ियाँ  पहनती थी.  आज भी चूड़ियों  का काफी महत्व है और इसके कई प्रकार भी होते हैं.
चूड़ी  को तमिल में वलायल और तेलगु में गाजू भी कहा जाता है. ईंग्लिश में इसे बेंगल कहते है जो हिंदी के ही शब्द बंगरी से बना है जिसका अर्थ होता है-ग्लास, चूंकि चूड़ी सबसे ज्यादा ग्लास यानि कांच के ही प्रचलित थे. पर आधुनिक समय में ये सोना, चांदी, प्लेटिनम, प्लास्टिक, लकड़ी और फेरस मटेरिअल के भी काफी प्रचलन में है. एक समय में लाह की चूड़ी भी काफी प्रचलित थी और आज भी कुछ क्षेत्र में शादीशुदा लड़की शादी के कुछ दिनों के बाद तक लाह की चूड़ी अवश्य ही पहनती है. पर किसी भी प्रकार की चूड़ी परंपरागत भारतीय महिलाओं में ज्यादा लोकप्रिय है और वे इसे शादी के बंधनों का प्रतीक मानती हैं. आकार में सामान्यतया यह गोल होती हैं और ब्रासलेट के विपरीत यह लचीला नहीं बल्कि कड़ा  होता है. ऐसा माना जाता है कि  इसका दूसरा नाम कड़ा  इसलिए भी पड़ा होगा चूंकि ये नरम न होकर कड़े होते हैं.

कड़ा:-  चुड़ीयों में सबसे पहले कड़ा का प्रचलन था. संभवत: यह आज भी प्रचलित है. धीरे-धीरे कड़ा  के स्थान पर पोंची आया जो कोनिकल सेप का होता था. अब यह कड़ा  चूड़ियों  के साथ पहना जाने लगा है जो किसी सुहागन को विवाह के समय वर पक्ष द्वारा दिया जाता है. पोंची का प्रचलन आज भी राजस्थान में है. यह सिल्वर तथा मोती का बना होता है जो सुहागन को वह भी वर पक्ष द्वारा दिया जाता है. चूड़ियों  का उत्पादन सर्वाधिक लखनऊ और कानपूर में होता है पर अगर कांच की चूड़ियों  की बात की जाय तो इसका सर्वाधिक उत्पादन उत्तर भारत के फिरोजाबाद शहर में सबसे ज्यादा होता है. भारत में हैदराबाद में चूड़ियों  का एक ऐतिहासिक बाजार 'लाड बाजार' भी है.

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शादी में वस्त्र और साड़ी की महत्ता

 शादी का भारतीय संस्कृति में अपना एक अलग महत्व है और शादी में पहने जाने वाला वस्त्र उसके परछाई  का काम करता है | साड़ी शब्द की उत्पत्ति प्राकृत शब्द सत्तिका से हुई है जैसा की बौद्ध व जैन धर्मों के ग्रंथों से मिलता है. भारत के अलावा साड़ी नेपाल, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, भूटान, मलेशिया, थाईलैंड आदि देशों में भी प्रचालन में हैं.  संभवतः ऐसा माना जाता  है की  वर -वधु अपने वस्त्र से अपने राज्य का परिचय देते है.  जैसे राजस्थानी लहंगा चुंदरी, हैदराबादी खरा दुपट्टा, मुस्लिम गरारा- शरारा, मारवाड़ी घागरा, कश्मीरी फिरन सलवार |जो काफी कलात्मक ढंग से बनी  होती है. इन सारे वस्त्रों से अधिक  चलन अब साड़ी हो गया है जिसे प्रायः देश के कोने -कोने के लोग पसंद करते हैं . शादी के समय कन्याओं को लाल या पीले रंग कि साड़ी पहनाई जाती है जिसे शुभ माना जाता है.
   वास्तव में साड़ी एक बिना सिला हुआ वस्त्र है जिसकी लम्बाई चार मीटर से नौ मीटर होती है. साड़ी को विभिन्न अंदाज में पहना जाता है. सामान्यतया साड़ी को कमर में लपेट कर इसका दूसरा छोड़ कंधे पर लेते हैं और प्रचलन के अनुसार इसके साथ पेटीकोट और ब्लाउज भी पहना जाता है.

             पुराने ज़माने मे दर्जी हुआ करते थे जो वर-वधु के कपड़े बनाते थे लकिन अब जमाना डिजाइनर्स का है और वे नए-नए डिज़ाइंस के वधु के परिधान तैयार कर रहे हैं. यहाँ तक कि आज साडियों के डिजाइन तथा इसके पहनने के तरीकों में भी काफी परिवर्तन देखे जा सकते हैं. आन्ध्रप्रदेश ने साड़ी पहनने के स्टायल के निवि, तमिलनाडु में द्रविडियन, बंगाली व ओड़िया तथा कल्चर और क्षेत्र के अनुसार इसे अन्य बहुत सारे तरीकों से पहना जा सकता है. पहले साड़ी सिल्क व कॉटन के हुआ करते थे पर अब इनके अलावे पॉलिस्टर, नायलोन व रेयोन के भी होते हैं.जड़ी  का काम किया गया साड़ी भी खासा प्रचालन में है और साड़ी पर सोने या चांदी की कढ़ाई भी की जाती है. वैसे तो साड़ी के सैकड़ों प्रकार भारत में होते हैं पर उत्तर भारत में इसके दो प्रकार बनारसी व शालू का प्रचालन सबसे ज्यादा है. और विवाह के अवसर पर तो बनारसी के बिना.....कुछ कमी सी लगती है.

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सुहाग का प्रतीक- सिन्दूर

प्राचीन हिंदू संकृति में भी सिन्दूर का काफी महत्व था.ऐसा माना जाता है कि यह प्रथा 5 हजार  वर्ष पूर्व से ही प्रचलित है. यह सुहागन का सबसे बड़ा एवं आकर्षक श्रृंगार  माना जाता है. सिन्दूर लाल पाउडर की  तरह होता है जिसे सुहागन अपने बालों के  बीच लगाती है. यह हिंदू धर्म में शादीशुदा होने का प्रतीक माना जाता है. सिन्दूर के संबंध में  माना जाता है कि यह प्यार और ताकत का प्रतीक  है. जो सुहागन अपने अपने पति के नाम से अपनी मांग में सजाती है और उनकी लंबी आयु की  कामना करती है. कन्या के मांग में पहले सिन्दूर उसके  शादी  के  दिन पति द्वारा सजाया जाता है जिसे हिंदू विवाह में सिंदूरदान कहा जाता है. सिन्दूर के सम्बन्ध  में कुछ वैदिक  धारणा भी है कि इसे लगाने के बाद पति को अपनी पत्नी का रक्षक बनना होता है तथा उसे हर सुख दुःख का साथी भी बनना पड़ता है. भारत में ऐसी  कई फ़िल्में बनी है जिसमे सिन्दूर के महत्व को बताया गया है जिसमें एक है 'सिन्दूर तेरे  नाम' जो 1987 में  रिलीज  हुई  थी. आधनिक युग में भी सिन्दूर का काफी महत्व है खासकर हिंदू धर्म में आज भी उतना ही जितना पहले था. आज कल मुस्लिम धर्म में भी सिन्दूर का प्रचलन हो गया है. सिन्दूर को ही कुमकुम के नाम से जाना जाता है जो टर्मरिक, लाइम और हर्बल  प्रोडक्ट का बना होता है. सिन्दूर के संबंध में पौराणिक मान्यता के अलावा कुछ वैज्ञानिक कारण भी है. इससे रक्त चाप तथा पिट्यूटरी  ग्लैंड भी नियंत्रित होता है. आजकल बाजार में जो कुमकुम उपलब्ध है वो जहरीले होते है क्योकि वे लेड ऑक्साइड  के बने होते हैं. इस प्रकार जहां  तक सिन्दूर की  लोकप्रियता का सवाल है इसकी  लोकप्रियता ग्रंथों में भी देखने को मिलती है.

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शुभ प्रतीक -बिंदी

हिंदू धर्म में बिंदी औरतों के लिए शुभ प्रतीक माना जाता है . बिंदी संस्कृत शब्द से आया है जिसका अर्थ पॉइंट से है. बिंदी को अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. जैसे हिंदू में तिलक, तमिल और मलयालम में पोट्टु, तिलाकम तेलगु में, बोट्टू कन्नड़ में, टीप बंगला में. बिंदी प्रायः औरतों द्वारा दोनों आईब्रो के बीच में लगाया जाता है. हिंदू धर्म में औरतें बिंदी सिन्दूर से लगाती है. बिंदी को पार्वती जी का प्रतीक माना जाता है और सच्ची निष्ठा का प्रतीक भी माना जाता है. बिंदी के संबंध में माना जाता है कि लाल रंग की बिंदी सुहागन के साथ किसी अशुभ होने से रोकती है तथा परिवार की रक्षा करती है. बिंदी सुहागन की  सुंदरता को भी बढाती है.  इसके संबंध में अलग अलग प्रातों में अलग अलग मान्यता है.

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